जनवरी 12, 2026

वक़्फ़ अधिनियम 2025 में कुछ संशोधन भारतीय नागरिकों के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन हैं

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वक़्फ़ अधिनियम 2025 में कुछ संशोधन भारतीय नागरिकों के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन हैं

लेखक: मोहम्मद बुरहानुद्दीन क़ासमी
संपादक, ईस्टर्न क्रेसेंट, मुंबई

वक़्फ़ अधिनियम 1995 में किए गए संशोधन—जिसे अब “वक़्फ़ (संशोधन) अधिनियम 2025” कहा जा रहा है—भारत के संवैधानिक और इस्लामी ढांचे के लिए गंभीर चिंता का विषय हैं। इसके कई प्रावधान मनमाने, अव्यवहारिक और संविधान के अनुच्छेद 14, 15, 25, 26 और 29 के तहत गारंटीकृत मौलिक अधिकारों का सीधा उल्लंघन करते हैं। इन बदलावों का उद्देश्य वक़्फ़ संस्थाओं में पारदर्शिता और संचालन को सुधारना नहीं, बल्कि मुसलमानों की धार्मिक स्वतन्त्रता को बाधित करना और उनके धार्मिक मामलों में हस्तक्षेप करना प्रतीत होता है, जो कि एक खतरनाक उदाहरण बन सकता है।

सबसे आपत्तिजनक संशोधनों मे एक यह है कि अब कोई व्यक्ति तब तक वक़्फ़ नहीं कर सकता जब तक वह “कम से कम पाँच वर्षों से अमल करने वाला मुसलमान” न रहा हो। यह शर्त इस्लामी शरीअत में कहीं नहीं है और संविधान के अनुच्छेद 25 और 26 का भी उल्लंघन करती है, जो हर नागरिक को अपने धर्म का पालन करने और धार्मिक संस्थाएं संचालित करने की आज़ादी देता है। इस्लाम में वक़्फ़ एक इबादत और सदक़ा-ए-जारीया (निरंतर दान) का कार्य है, जिसमें पाँच साल की शर्त कहीं नहीं रखी गई है। यह संशोधन विशेष रूप से नए मुसलमानों को इस धार्मिक अधिकार से वंचित करता है और संविधान के अनुच्छेद 14 (कानून के समक्ष समानता) और अनुच्छेद 15 (धर्म के आधार पर भेदभाव का निषेध) का भी उल्लंघन करता है।

वक़्फ़ अधिनियम 2025 में कुछ संशोधन भारतीय नागरिकों के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन हैं

एक अन्य आपत्तिजनक संशोधन यह है कि अब गैर-मुसलमानों को राज्य वक़्फ़ बोर्ड और केंद्रीय वक़्फ़ परिषद में अनिवार्य रूप से शामिल किया जाएगा। यह सीधे अनुच्छेद 26 और 29 का उल्लंघन है, जो अल्पसंख्यकों को अपने धार्मिक और परोपकारी संस्थानों का प्रबंधन करने का अधिकार देता है। यदि हिंदू अपने मंदिरों, ईसाई अपने गिरजाघरों और सिख अपने गुरुद्वारों का स्वतंत्र रूप से प्रबंधन करते हैं, तो मुसलमानों को यह स्वतन्त्रता क्यों नहीं दी जा रही? यह संशोधन विशेष रूप से मुस्लिम समुदाय को निशाना बनाता है और शासन में दोहरे मापदंड स्थापित करता है, जो भारत के संविधान की धर्मनिरपेक्ष आत्मा के विरुद्ध है।

इसके अतिरिक्त यह अधिनियम ज़िलाधिकारी और अन्य सरकारी अधिकारियों को वक़्फ़ संपत्तियों की पहचान, समीक्षा और यहाँ तक कि उन्हें रद्द करने का अत्यधिक अधिकार देता है। इससे सरकारी दख़लंदाज़ी और दुरुपयोग की संभावना बढ़ जाती है, और प्रशासनिक सुधार के नाम पर वक़्फ़ संपत्तियों पर क़ब्ज़े को वैध बनाया जा सकता है। इससे धार्मिक अल्पसंख्यकों की स्वायत्तता कमजोर होती है और उन सदियों पुराने संस्थानों को खतरा होगा जो ग़रीबों, अनाथों, शिक्षा और धार्मिक कार्यों के लिए समर्पित हैं।

“प्रयोग द्वारा वक़्फ़” (Waqf by user) की अवधारणा को हटाया जाना भी चिंताजनक है, जिससे उन संपत्तियों पर मुसलमानों का नियंत्रण कमजोर होगा जो पीढ़ियों से जनसेवा के लिए इस्तेमाल हो रही हैं।

एक मूलभूत प्रश्न यह उठता है: “अमल करने वाला मुसलमान” कौन है, इसका निर्धारण कौन करेगा? क्या अब सरकारें तय करेंगी कि कौन कितना मुसलमान है और कौन नहीं? क्या अब कोई पैमाना तैयार किया गया है जिससे किसी की धार्मिकता मापी जा सके? यह विचार इस्लामिक दृष्टिकोण से गलत है, क्योंकि इस्लाम में किसी भी प्रकार की श्रेणी या पदानुक्रम नहीं है जो किसी को ‘प्रैक्टिसिंग’ या ‘नॉन-प्रैक्टिसिंग’ घोषित करे। केवल अल्लाह ही किसी की नीयत और ईमान को जानता है। यह प्रावधान संविधान के अनुच्छेद 25 का सीधा उल्लंघन है, जो हर व्यक्ति को अंतरात्मा की स्वतंत्रता और व्यक्तिगत व सामूहिक रूप से धर्म का पालन करने का अधिकार देता है।

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वक़्फ़ (संशोधन) अधिनियम 2025 की कई धाराएं इस्लामिक शिक्षाओं के खिलाफ और भारतीय संविधान के मूल सिद्धांतों से टकराती हैं। यह मुसलमानों की धार्मिक स्वतंत्रता को सीमित करती हैं, उन्हें अन्य धर्मों के अनुयायियों की तुलना में असमान व्यवहार का शिकार बनाती हैं और वक़्फ़ संपत्तियों पर सरकारी क़ब्ज़े का रास्ता खोलती हैं।

इन संशोधनों का विरोध केवल मुसलमानों को ही नहीं, बल्कि उन सभी नागरिकों को करना चाहिए जो लोकतंत्र, धर्मनिरपेक्षता और भारत के संविधान में विश्वास रखते हैं। ये संशोधन मौलिक अधिकारों, क़ानून के समक्ष समानता और अल्पसंख्यक अधिकारों—जो कि भारत के संवैधानिक ढांचे की नींव हैं—का उल्लंघन करते हैं। भारत के माननीय सर्वोच्च न्यायालय को इन संशोधनों का स्वतः संज्ञान लेना चाहिए था, परन्तु चूँकि इस विषय में पहले ही याचिकाएँ दाखिल की जा चुकी हैं, इसलिए उम्मीद की जाती है कि अदालत संविधान की भावना और न्याय के मूल आधार पर फैसला सुनाएगी।

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