इलेक्शन कमीशन की गलतियों की सज़ा आम भारतीय नागरिक क्यों भुगतें?

Eastern Crescent
14 Min Read
5 Views
14 Min Read

इलेक्शन कमीशन की गलतियों की सज़ा आम भारतीय नागरिक क्यों भुगतें?

लेखक: मुहम्मद बुरहानुद्दीन क़ासमी
एडिटर: ईस्टर्न क्रिसेंट, मुंबई

चुनावी मतदाता सूचियों के चल रहे विशेष गहन पुनरीक्षण (Special Intensive Revision—SIR) ने एक ऐसा बुनियादी सवाल खड़ा कर दिया है, जिसे नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता: यदि मतदाता रिकॉर्ड में मौजूद विसंगतियाँ पहले की प्रशासनिक प्रक्रियाओं, गलतियों या पेशेवर लापरवाही का परिणाम हैं, तो उनका पूरा बोझ आम नागरिक क्यों उठाए? और वह भी तब, जब इसके कारण उसे अपने मतदान के अधिकार तथा भारत के नागरिक के रूप में प्राप्त अधिकारों और सुविधाओं से वंचित होने का खतरा पैदा हो जाए?

पिछले SIR अभियानों में मतदाता विवरण का संकलन मुख्यतः मैन्युअल तरीके से होते आ रहा है। अनेक स्थानों पर फॉर्म हाथ से भरे गए और फील्ड स्तर के कर्मचारियों ने कठिन परिस्थितियों में रिकॉर्ड तैयार किए। ऐसी स्थिति में नाम, लिंग, तस्वीर, पता, वर्तनी, आयु और अन्य विवरणों में गलती की पर्याप्त गुंजाइश रहती है। बाद में डिजिटल प्रणालियों के विस्तार और ECINET के माध्यम से मतदाता संबंधी जानकारी ऑनलाइन दर्ज किए जाने के बाद ऐसी अनेक विसंगतियाँ सुधारी गईं या बाद की मतदाता सूचियों में उनका स्वरूप बदल गया। कई मामलों में यह सुधार स्वयं मतदाताओं के अतिरिक्त प्रयासों के कारण संभव हुआ।

यह स्थिति जिम्मेदारी से जुड़ा एक बुनियादी सवाल खड़ा करती है। यदि किसी गलती या चूक की शुरुआत पुराने मतदाता पंजीकरण या जनगणना की प्रक्रिया के दौरान हुई थी, तो उसकी जिम्मेदारी स्वतः नागरिक पर क्यों डाल दी जाए? जो व्यक्ति वर्षों से मतदाता सूची में दर्ज है, उसे केवल इसलिए अपनी अहलियत फिर से साबित करने के लिए बाध्य नहीं किया जाना चाहिए कि किसी पुराने प्रशासनिक रिकॉर्ड में कोई गलती रह गई थी। कम से कम इतना तो सुनिश्चित होना चाहिए कि पूरा बोझ नागरिक पर न डाला जाए और उसे अपनी अहलियत साबित करने का उचित तथा निष्पक्ष अवसर मिले।

लगभग 13 करोड़ वयस्क भारतीय इस समय अनिश्चितता की स्थिति में हैं और उनके नागरिक अधिकारों पर सवाल खड़े हो रहे हैं, मुख्यतः इसलिए कि उनके पुराने रिकॉर्ड वर्तमान रिकॉर्ड से मेल नहीं खाते या वे अपने पुराने यानी लीगेसी डेटा को खोजने का तरीका नहीं जानते।

यह मुद्दा पश्चिम बंगाल में हाल ही में हुई घटनाओं को देखने पर और भी गंभीर हो जाता है। SIR की प्रक्रिया के दौरान अलग-अलग चरणों में 90 लाख से अधिक नाम मतदाता सूचियों से हटाए गए। रिपोर्टों के अनुसार इस प्रक्रिया में लाखों मामलों को निर्णय और सत्यापन की आवश्यकता पड़ी। इनमें कुछ नाम बाद में फिर से शामिल किए गए, जबकि कुछ नाम बाहर ही रह गए।

Advertisement
Advertisement

यह अनुभव एक बड़ा लोकतांत्रिक सवाल उठाता है: यदि चुनाव से ठीक पहले इतनी बड़ी संख्या में मतदाताओं के नाम मतदाता सूची से हटा दिए जाएँ और चुनाव के समय भी उनकी अहलियत विवादित या समीक्षा के अधीन हो, तो ऐसे चुनाव को किस हद तक संतोषजनक माना जा सकता है? और यदि ऐसे कई लोग, जो SIR की प्रक्रिया के कारण मतदान नहीं कर सके, चुनाव समाप्त होने के बाद फिर से वास्तविक और अहल मतदाता के रूप में बहाल कर दिए जाएँ, तो उस चुनाव की निष्पक्षता पर सवाल उठना स्वाभाविक है।

भले ही चुनाव आयोग ने एक निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार कार्रवाई की हो, फिर भी इतनी बड़ी संख्या में नाम हटाए जाने की स्थिति असाधारण पारदर्शिता, कठोर जांच और मजबूत सुरक्षा उपायों की मांग करती है। वैकल्पिक रूप से, चुनाव तब तक स्थगित किया जाना चाहिए जब तक SIR के बाद मतदाता सूची को अंतिम रूप न दे दिया जाए। किसी मतदाता का चुनाव में भाग लेने का अधिकार दशकों पुराने किसी दफ्तरी रिकॉर्ड की शुद्धता या आम नागरिक की इस क्षमता पर निर्भर नहीं होना चाहिए कि वह कम समय में एक जटिल सत्यापन प्रक्रिया को समझकर पूरा कर सके।

यही सिद्धांत निर्वाचन क्षेत्रों के परिसीमन पर भी लागू होता है। असम में चुनाव आयोग ने 2023 में परिसीमन की प्रक्रिया पूरी की। आयोग के अनुसार इस दौरान राजनीतिक दलों और अन्य संगठनों की ओर से प्राप्त सुझावों और आपत्तियों पर विचार किया गया, जिनमें जनसांख्यिकीय स्थिति तथा विभिन्न सामाजिक समूहों के प्रतिनिधित्व से जुड़े मुद्दे भी शामिल थे।

हालाँकि, एक-दूसरे से लगे निर्वाचन क्षेत्रों में मतदाताओं की संख्या और संरचना में यदि उल्लेखनीय अंतर दिखाई देता है, तो उसके कारणों की सार्वजनिक रूप से जांच और स्पष्टीकरण आवश्यक है। यदि किसी निर्वाचन क्षेत्र में मतदाताओं की संख्या दूसरे की तुलना में बहुत अधिक है, तो इसके पीछे के कारण पारदर्शी, वस्तुनिष्ठ और संवैधानिक सिद्धांतों के अनुरूप होने चाहिए।

परिसीमन को धर्म, भाषा या नस्ल के आधार पर मतदाताओं के वर्गीकरण या प्रोफाइलिंग का माध्यम नहीं बनाया जा सकता। न ही इसका उपयोग किसी विशेष राजनीतिक दल या समूह को जनसंख्या के आंकड़ों के आधार पर राजनीतिक लाभ पहुँचाने के लिए किया जाना चाहिए। संवैधानिक सिद्धांत यही होना चाहिए कि सभी नागरिकों को समान राजनीतिक प्रतिनिधित्व मिले और जाति, रंग, भाषा या धार्मिक संबद्धता के आधार पर किसी के साथ भेदभाव न हो।

SIR के लिए लगाए जा रहे मानव संसाधन से जुड़ा प्रश्न भी गंभीर है। कई स्थानों पर बूथ लेवल ऑफिसर (BLO) नियमित सरकारी कर्मचारी होते हैं, जिनमें स्कूल शिक्षक भी शामिल हैं। उनसे उनकी सामान्य जिम्मेदारियों के साथ-साथ मतदाता गणना, सत्यापन और रिकॉर्ड संबंधी विस्तृत कार्य भी कराया जाता है।

यहाँ एक व्यावहारिक और प्रशासनिक सवाल उठता है: जो व्यक्ति पहले से ही नियमित शिक्षण कार्य की जिम्मेदारी संभाल रहा है, क्या वह उसी समय बड़े पैमाने पर चलने वाले, समयबद्ध चुनावी अभियान को अपेक्षित सटीकता और एकाग्रता के साथ पूरा कर सकता है?

महाराष्ट्र से सामने आ रही स्थिति इस संदर्भ में विशेष ध्यान की मांग करती है। रिपोर्टों के अनुसार कई स्थानों पर BLOs पर अत्यधिक काम का दबाव है, वे अपनी क्षमता से अधिक जिम्मेदारियाँ निभाने के लिए मजबूर हैं और कुछ मामलों में उन्हें इस प्रक्रिया की तकनीकी आवश्यकताओं के संबंध में पर्याप्त प्रशिक्षण भी नहीं मिला है। जब काम का बोझ असामान्य रूप से बढ़ जाए और पर्याप्त प्रशिक्षण, संसाधन तथा प्रशासनिक सहयोग उपलब्ध न हो, तो गलतियों की संभावना बढ़ना स्वाभाविक है। लेकिन इन गलतियों के परिणाम अंततः आम नागरिकों को भुगतने पड़ते हैं।

यही इस पूरे मामले का केंद्रीय विरोधाभास है: चुनावी रिकॉर्ड प्रशासन तैयार करता है, प्रशासन ही उसमें बदलाव और सत्यापन करता है और प्रशासन ही उसके पुनरीक्षण की प्रक्रिया चलाता है; लेकिन जब रिकॉर्ड में कोई विसंगति सामने आती है, तो उसके परिणामों का बोझ अक्सर नागरिक पर डाल दिया जाता है। लोकतांत्रिक प्रशासन का सामान्य सिद्धांत ऐसा नहीं हो सकता।

मतदाता सूची महज सरकार का कोई डेटाबेस नहीं है। यही वह आधार है जिसके माध्यम से नागरिक प्रतिनिधि शासन में अपनी लोकतांत्रिक और संवैधानिक भागीदारी सुनिश्चित करते हैं। इसलिए किसी व्यक्ति का नाम मतदाता सूची से हटाने के मामले में अत्यधिक सावधानी बरती जानी चाहिए। नाम की वर्तनी, पता, आयु या पुराने रिकॉर्ड में मौजूद किसी विसंगति को नागरिक की गलती या संदिग्धता मानने के बजाय सत्यापन का आधार बनाया जाना चाहिए।

यहाँ मतदान के अधिकार और नागरिकता के बीच अंतर को समझना भी अत्यंत आवश्यक है। किसी व्यक्ति का नाम मतदाता सूची से बाहर हो जाना अपने आप में यह कानूनी प्रमाण नहीं है कि वह भारतीय नागरिक नहीं है। इसलिए मतदाता सूची के सत्यापन की प्रक्रिया ऐसी नहीं होनी चाहिए जिससे किसी प्रशासनिक विसंगति के कारण नागरिक को यह भय पैदा हो कि उसकी राष्ट्रीयता या नागरिकता से जुड़े अधिकार ही खतरे में पड़ गए हैं।

Advertisement
Advertisement

हालाँकि, पश्चिम बंगाल, दिल्ली और उत्तर प्रदेश के कुछ हिस्सों से सामने आ रही रिपोर्टें चिंताजनक हैं। SIR के दौरान जिन नागरिकों के नाम हटाए गए, उनमें से कुछ को कथित रूप से उन अधिकारों और सेवाओं के संबंध में कठिनाइयों का सामना करना पड़ा है, जो सामान्यतः इस देश के नागरिकों को प्राप्त होती हैं।

चुनाव आयोग के कामकाज और उसकी कार्यशैली को लेकर भी विभिन्न वर्गों की ओर से लगातार सवाल उठाए जाते रहे हैं। लगभग सभी विपक्षी दलों ने बार-बार अपनी आपत्तियाँ दर्ज कराई हैं, हालांकि इन आपत्तियों का अब तक सीमित प्रभाव दिखाई दिया है। इंडियन एक्सप्रेस की पत्रकार रितिका चोपड़ा की हालिया रिपोर्टिंग ने भी इस बहस को नई गति दी है और चुनाव आयोग के कामकाज तथा उसके तौर-तरीकों को लेकर उठाए जा रहे सवालों को अधिक चर्चा में ला दिया है।

जनता में बढ़ते असंतोष को इसी व्यापक संदर्भ में देखा जाना चाहिए। INDIA ब्लॉक और Cockroach Janta Party (CJP) ने SIR के विरोध में 2 अक्टूबर से देशव्यापी प्रदर्शन शुरू करने की घोषणा की है। इसके बाद महाराष्ट्र में शिवसेना (UBT) की ओर से भी विरोध प्रदर्शन का आह्वान किया गया है। चुनाव आयोग, मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार और CJI सूर्यकांत से संबंधित उनके उठाए गए सवाल गंभीर विषय हैं और इन पर सार्वजनिक ध्यान तथा जांच की आवश्यकता है।

ये घटनाक्रम चुनावी पारदर्शिता और चुनाव आयोग के कामकाज को लेकर चल रही व्यापक राजनीतिक और सार्वजनिक बहस को दर्शाते हैं। ‘Save Democracy’ आंदोलन भी गति पकड़ रहा है और संभव है कि यह भारत में लंबे समय से अपेक्षित चुनावी सुधारों की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल बने।

हालाँकि, चुनावी हेरफेर, सांप्रदायिक पक्षपात या जानबूझकर गलत काम किए जाने जैसे आरोपों को केवल धारणाओं के आधार पर स्वीकार करने के बजाय प्रमाण और उचित जांच के माध्यम से स्थापित किया जाना चाहिए। चुनाव आयोग ने अपनी प्रक्रियाओं का बचाव किया है, जबकि विपक्षी दलों और नागरिक संगठनों ने गंभीर आपत्तियाँ उठाई हैं।

ऐसी स्थिति में लोकतांत्रिक रास्ता यही है कि पारदर्शिता बढ़ाई जाए, स्वतंत्र जांच की व्यवस्था हो, रिकॉर्ड तक नागरिकों की आसान पहुँच सुनिश्चित की जाए और प्रभावित मतदाताओं के लिए प्रभावी शिकायत निवारण की व्यवस्था उपलब्ध हो। दोषी कोई भी हो और कितना भी प्रभावशाली क्यों न हो, जवाबदेही सुनिश्चित होनी चाहिए। नागरिकों के लिए अनावश्यक कठिनाइयाँ पैदा करना तथा लोकतांत्रिक और संवैधानिक प्रक्रियाओं को कमजोर करना गंभीर विषय माना जाना चाहिए।

चुनाव आयोग की जिम्मेदारी केवल चुनाव कराना नहीं है, बल्कि यह सुनिश्चित करना भी है कि प्रत्येक पात्र नागरिक विश्वास के साथ चुनावी प्रक्रिया में भाग ले सके। यदि पुराने चुनावी रिकॉर्ड में गलतियाँ हुई हैं, तो उन्हें व्यवस्थित और निष्पक्ष तरीके से सुधारा जाना चाहिए। नागरिकों को ऐसी प्रशासनिक कमियों का शिकार नहीं बनाया जा सकता, जिन पर उनका कोई नियंत्रण ही नहीं था।

भारत एक संप्रभु, समाजवादी, धर्मनिरपेक्ष, लोकतांत्रिक गणराज्य है और उसके चुनावों की विश्वसनीयता उसकी संवैधानिक व्यवस्था का केंद्रीय आधार है। भारतीयों के लिए भारत का विचार और उसकी लोकतांत्रिक पहचान अत्यंत महत्वपूर्ण है। हम राजनीतिक रूप से असहमत हो सकते हैं, लेकिन समान नागरिकता, समान प्रतिनिधित्व और पात्र नागरिकों के अपने प्रतिनिधि चुनने के अधिकार जैसे बुनियादी सिद्धांतों से समझौता नहीं किया जा सकता।

Advertisement
Advertisement

वर्तमान विवाद को केवल एक और राजनीतिक टकराव बनाने के बजाय व्यापक चुनावी सुधार के अवसर के रूप में देखा जाना चाहिए। मतदाता सूचियाँ सटीक और विश्वसनीय हों, प्रक्रिया पारदर्शी हो, BLOs को पर्याप्त प्रशिक्षण और संसाधन दिए जाएँ, नागरिकों को अपने रिकॉर्ड में मौजूद विसंगतियों को सुधारने का वास्तविक अवसर मिले और किसी भी पात्र मतदाता को केवल इसलिए मतदान के अधिकार से वंचित न किया जाए कि कई वर्ष पहले तैयार किए गए किसी चुनावी रिकॉर्ड में प्रशासनिक गलती रह गई थी।

गलतियाँ जहाँ भी हुई हैं, उनकी पहचान और सुधार बहुत देर होने से पहले किया जाना आवश्यक है।

Share This Article
कोई टिप्पणी नहीं

प्रातिक्रिया दे

आपका ईमेल पता प्रकाशित नहीं किया जाएगा. आवश्यक फ़ील्ड चिह्नित हैं *

Trending News

ईरान, वैश्विक प्रतिरोध और पश्चिमी वर्चस्व का अंत

ईरान, वैश्विक प्रतिरोध और पश्चिमी वर्चस्व का अंत लेखक: मोहम्मद बुरहानुद्दीन क़ासमी…

Eastern Crescent

“श्रोताओं की रुचि और विचारों की गहराई के बिना भाषण प्रभावहीन रहता है” _  सोहैल मसूद

“श्रोताओं की रुचि और विचारों की गहराई के बिना भाषण प्रभावहीन रहता…

Eastern Crescent

धन्यवाद, बिहार!

धन्यवाद, बिहार! मोहम्मद बुरहानुद्दीन क़ासमी संपादक: ईस्टर्न क्रेसेंट, मुंबई आज 29 जून…

Eastern Crescent

मरकज़ुल मआरिफ़ मुंबई ने किया शैक्षणिक सत्र 2025–26 की पहली इंग्लिश भाषण प्रतियोगिता का आयोजन

मरकज़ुल मआरिफ़ मुंबई ने किया शैक्षणिक सत्र 2025–26 की पहली इंग्लिश भाषण…

Eastern Crescent

“मैं अंदर थी — आज सुप्रीम कोर्ट में सिर्फ कानून नहीं, क़ौम खड़ी थी”

"मैं अंदर थी — आज सुप्रीम कोर्ट में सिर्फ कानून नहीं, क़ौम…

Eastern Crescent

अगली सुनवाई तक कोई नियुक्ति नहीं, वक्फ की वर्तमान स्थिति में कोई परिवर्तन नहीं किया जाए: सुप्रीम कोर्ट

अगली सुनवाई तक कोई नियुक्ति नहीं, वक्फ की वर्तमान स्थिति में कोई…

Eastern Crescent

Quick LInks

इलेक्शन कमीशन की गलतियों की सज़ा आम भारतीय नागरिक क्यों भुगतें?

इलेक्शन कमीशन की गलतियों की सज़ा आम भारतीय नागरिक क्यों भुगतें? लेखक:…

Eastern Crescent

मध्य-पूर्व में अमेरिका-इज़राइल धुरी को एक और बड़ा झटका

मध्य-पूर्व में अमेरिका-इज़राइल धुरी को एक और बड़ा झटका लेखक: मोहम्मद बुरहानुद्दीन…

Eastern Crescent

मध्य-पूर्व में अमेरिका-इज़राइल धुरी को एक और बड़ा झटका

मध्य-पूर्व में अमेरिका-इज़राइल धुरी को एक और बड़ा झटका लेखक: मोहम्मद बुरहानुद्दीन…

Eastern Crescent