अगस्त 8, 2026

ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड की कार्यकारिणी की बैठक संपन्न

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ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड की कार्यकारिणी की बैठक संपन्न
देश और मुस्लिम समुदाय की वर्तमान परिस्थितियों के संदर्भ में महत्वपूर्ण फैसले

 

नई दिल्ली, 22 जून 2026 (प्रेस नोट) :

ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड की हालिया कार्यकारिणी बैठक में देश और मुस्लिम समुदाय की वर्तमान स्थिति का विस्तार से जायज़ा लिया गया और कई महत्वपूर्ण निर्णय किए गए। ये निर्णय विशेष रूप से भाजपा शासित राज्यों में मुसलमानों के खिलाफ बढ़ती हुई भीड़ हिंसा (लिंचिंग), मस्जिदों और मदरसों के खिलाफ ध्वंसात्मक कार्रवाइयों, मुसलमानों के घरों और बस्तियों पर बुलडोज़र कार्रवाई, सरकारी कार्यक्रमों, स्कूलों और सरकारी सहायता प्राप्त मदरसों में वंदे मातरम् को अनिवार्य किए जाने की कोशिशों, विभिन्न राज्यों में यूनिफॉर्म सिविल कोड (UCC) लागू करने की प्रगति, तथा कमाल मौला/भोजशाला मस्जिद के संबंध में मध्य प्रदेश हाई कोर्ट के हालिया फैसले से संबंधित हैं।

 

कार्यकारिणी ने देश और मुस्लिम समुदाय की तेजी से बिगड़ती स्थिति पर गहरी चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि भाजपा शासित राज्यों में मुसलमानों की जान-माल, इज़्ज़त-आबरू, मस्जिदें, मदरसे, कब्रिस्तान, पर्सनल लॉ, मौलिक अधिकार, बल्कि उनका ईमान और आस्था तक निरंतर हमलों की ज़द में हैं। पूरे देश में नफ़रत, पक्षपात और सांप्रदायिक तनाव का वातावरण योजनाबद्ध ढंग से तैयार किया जा रहा है। यह अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण है कि इस माहौल को हवा देने वालों में स्वयं भाजपा के वरिष्ठ पदाधिकारी, बल्कि सरकार के ज़िम्मेदार लोग भी आगे दिखाई देते हैं, जबकि घृणा फैलाने वाले भाषणों और उकसावे के खिलाफ कोई प्रभावी कानूनी कार्रवाई नहीं की जाती। कार्यकारिणी ने इस बात पर भी खेद व्यक्त किया कि मुस्लिम समुदाय की जान-माल, इज़्ज़त-आबरू, धर्म और आस्था पर योजनाबद्ध हमलों के बावजूद धर्मनिरपेक्ष राजनीतिक दल आपराधिक चुप्पी साधे हुए हैं, मानो मुसलमान केवल एक वोट बैंक बनकर रह गए हों।

कार्यकारिणी ने निर्णय लिया कि मुस्लिम समुदाय की बिगड़ती स्थिति, सांप्रदायिक तनाव और मौलिक अधिकारों के उल्लंघन पर एक व्यापक दस्तावेज़ तैयार कर प्रकाशित किया जाएगा, ताकि देश के जागरूक, न्यायप्रिय और लोकतांत्रिक मूल्यों में विश्वास रखने वाले वर्गों के ज़मीर को झकझोरा जा सके। बोर्ड ने स्पष्ट किया कि देश के दूसरे सबसे बड़े समुदाय के अधिकारों का हनन केवल एक वर्ग की समस्या नहीं है, बल्कि इसका सीधा प्रभाव देश की लोकतांत्रिक संरचना, सामाजिक सौहार्द और विकास प्रक्रिया पर पड़ता है; इस दृष्टि से यह पूरे देश का नुकसान है।

 

कमाल मौला मस्जिद/भोजशाला मामले के संबंध में कार्यकारिणी ने मध्य प्रदेश हाई कोर्ट के फैसले पर गहरी चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि यह निर्णय ऐतिहासिक साक्ष्यों, राजस्व अभिलेखों, औपनिवेशिक काल के सरकारी दस्तावेज़ों और सदियों पुरानी मुस्लिम इबादत की परंपरा के विरुद्ध है। इसके अतिरिक्त, यह फैसला पूजा स्थलों से संबंधित अधिनियम, 1991 (Places of Worship Act, 1991) की भावना के भी प्रतिकूल है। कार्यकारिणी ने इस बात का स्वागत किया कि कमाल मौला मस्जिद कमेटी ने इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है, और यह तय किया कि ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड इस कानूनी संघर्ष में मस्जिद कमेटी को हर संभव सहायता प्रदान करेगा।

 

कार्यकारिणी ने वंदे मातरम् को अनिवार्य बनाने की कोशिशों को भारतीय संविधान के अनुच्छेद 25 के विरुद्ध बताया। बोर्ड ने स्पष्ट किया कि यदि केंद्र सरकार इस संबंध में कोई ऐसा कदम उठाती है जिसके परिणामस्वरूप संसद के माध्यम से सभी नागरिकों या स्कूली छात्रों के लिए वंदे मातरम् पढ़ना अनिवार्य किया जाता है, तो बोर्ड इसके खिलाफ अदालत का दरवाज़ा खटखटाएगा। इसी प्रकार, कार्यकारिणी ने पश्चिम बंगाल सरकार द्वारा स्कूलों और सरकारी सहायता प्राप्त एवं मान्यता प्राप्त मदरसों में वंदे मातरम् को अनिवार्य किए जाने के निर्णय को मौलिक अधिकारों का उल्लंघन तथा सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले बिजोए इमैनुएल बनाम केरल राज्य (1986) के विरुद्ध बताया, और इसे तत्काल वापस लेने की मांग की।

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कार्यकारिणी ने कलकत्ता हाई कोर्ट के उस अंतरिम आदेश का स्वागत किया, जिसमें मदरसों में वंदे मातरम् गाने को अनिवार्य करने वाली सरकारी अधिसूचना पर रोक लगा दी गई। अदालत ने प्रथम दृष्टया यह माना है कि अल्पसंख्यक समुदाय की धार्मिक मान्यताओं और भावनाओं की अनदेखी करते हुए मदरसों में वंदे मातरम् गाना अनिवार्य नहीं किया जा सकता, और यदि कोई मदरसा या छात्र ऐसा नहीं करता तो उसके खिलाफ कोई अनुशासनात्मक कार्रवाई भी नहीं की जा सकती। कार्यकारिणी ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि वंदे मातरम् एक शिर्किया गीत है, जिसके कुछ अंश मुसलमानों के तौहीद के अकीदे के विरुद्ध हैं; इसलिए मुसलमानों के लिए इसका पाठ करना शरीअत की दृष्टि से उचित नहीं है। बोर्ड ने मुसलमानों से अपील की कि वे सहिष्णुता या देशभक्ति के नाम पर अपने ईमान और अकीदे से कोई समझौता न करें।

 

कार्यकारिणी ने भाजपा शासित राज्यों में यूनिफॉर्म सिविल कोड के नाम पर जारी विधायी प्रयासों पर भी गंभीर चिंता व्यक्त की। बैठक में कहा गया कि उत्तराखंड और गुजरात के बाद अब असम, मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र में भी यूसीसी लागू करने की तैयारी की जा रही है। बोर्ड ने स्पष्ट किया कि यूनिफॉर्म सिविल कोड ऐसा अनिवार्य संवैधानिक आदेश नहीं है, जिसे अदालतें लागू करने के लिए बाध्य हों; बल्कि यह संविधान के राज्य के नीति-निर्देशक तत्वों में शामिल एक गैर-बाध्यकारी मार्गदर्शक सिद्धांत है। इसके अतिरिक्त, यूसीसी का जबरन लागू किया जाना भारतीय संविधान के अनुच्छेद 25 के तहत प्रदत्त धार्मिक स्वतंत्रता के विरुद्ध है और देश की बहुलतावादी तथा विविधतापूर्ण सामाजिक संरचना के भी खिलाफ है। कार्यकारिणी ने निर्णय लिया कि जिस प्रकार बोर्ड ने उत्तराखंड सरकार के यूसीसी कानून को नैनीताल हाई कोर्ट में चुनौती दी है, उसी प्रकार अन्य राज्यों में भी ऐसे कानूनों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई की जाएगी।

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कार्यकारिणी ने यह भी तय किया कि मुसलमानों को सामाजिक और राजनीतिक रूप से हाशिये पर धकेलने, संवैधानिक प्रावधानों के उल्लंघन, नफ़रत और दुश्मनी के प्रसार, सांप्रदायिक सौहार्द को नुकसान पहुँचाने, मुसलमानों की जान-माल, इज़्ज़त-आबरू पर हमलों, तथा मस्जिदों और मदरसों के ध्वंस के खिलाफ ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड देश के न्यायप्रिय, लोकतंत्र-समर्थक और अमन-पसंद तबकों को साथ लेकर एक देशव्यापी आंदोलन शुरू करेगा। इस उद्देश्य के लिए एक एक्शन कमेटी का गठन किया जा रहा है।

 

बैठक की अध्यक्षता बोर्ड के अध्यक्ष मौलाना खालिद सैफुल्लाह रहमानी ने की और कार्यवाही का संचालन बोर्ड के महासचिव मौलाना फज़लुर्रहीम मुजद्दिदी ने किया। बैठक में देशभर से कार्यकारिणी के सदस्यों ने भाग लिया, जिनमें विशेष रूप से उपाध्यक्ष मौलाना अरशद मदनी, अध्यक्ष जमीयत उलेमा-ए-हिंद; मौलाना उबैदुल्लाह खान आज़मी, पूर्व सांसद; जनाब सैयद सआदतुल्लाह हुसैनी, अमीर जमाअत-ए-इस्लामी हिंद; मौलाना असगर इमाम मेहदी, अध्यक्ष मरकज़ी जमीयत अहले हदीस; सचिव मौलाना उमरैन महफूज़ रहमानी और मौलाना यासीन अली उस्मानी; राष्ट्रीय प्रवक्ता डॉ. एस. क्यू. आर. इलियास; वरिष्ठ अधिवक्ता जनाब यूसुफ हातीम मुच्छाला और जनाब एम. आर. शमशाद; महिला प्रकोष्ठ की संयोजक एडवोकेट जलीसा सुल्ताना; बैरिस्टर असदुद्दीन ओवैसी, सांसद; जनाब आरिफ मसूद; मौलाना अबू तालिब रहमानी; मौलाना सज्जाद नोमानी; तथा मौलाना खालिद रशीद फरंगी महली आदि शामिल थे।

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प्रेस कॉन्फ्रेंस को संबोधित करने वाले:
मौलाना फज़लुर्रहीम मुजद्दिदी, महासचिव
डॉ. एस. क्यू. आर. इलियास, राष्ट्रीय प्रवक्ता
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